कुमाऊँ में भवनों का निर्माण, शिल्प आरै सौन्दर्य
Keywords:
कुमाऊँ क्षेत्र, भवन निर्माण, सौन्दर्यAbstract
कला का मुख्य उद्ेश्य अपने समाज की तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों को सौन्दर्य भाव, रस के साथ अभिव्यक्त
करना हैं। कला और सौन्दर्य का सम्बन्ध अति प्राचीन है। कुमाऊँ में भवनों के निर्माण की शिल्पगत सुन्दरता और वास्तु
संरचना प्राचीन समय से ही चली आ रही है। यहाँ पर प्राचीन समय से ही जिन भवनों/मकानों का निर्माण किया जाता
था, उन्हें परम्परागत शिल्पकारों के द्वारा ही बनाया जाता था। और शिल्पकार वर्ग इन भवनों को निर्मित करने में पत्थरों
को काटने-छाँटने में हथौड़े, छेनी आदि लौह उपकरणों से तराशकर इन भवनों का निर्माण करते थे। कुमाऊँ क्षेत्र में बने
दो ढाई सौ साल पुराने भवनों के भग्नावशेष आज भी दिखाई देते है। कुमाऊँ में भवनों को निर्मित करने के लिए जिन
पत्थरों का प्रयोग किया जाता है, वे ग्रेनाइट व क्वार्ट्स पत्थर होते है। कुमाऊँ में भवन तल के निर्माण में सबसे पहले
‘गोठ’ का निर्माण किया जाता है, ‘गोठ’ का उपयोग मवेशियों को पालने के लिए किया जाता था। कुमाऊँ में भवन की
छत को ‘पाख’ कहते हैं। प्राचीन समय से ही भवनों के निर्माण की यही प्रक्रिया रही है। जिसका निर्माण यहाँ के स्थानीय
भवन शिल्पियों के द्वारा किया जाता है। इन भवन शिल्पियों को ‘राजमिस्त्री’ कहा जाता है। और इनके द्वारा इन भवनों
का निर्माण इतनी कुशलता से किया जाता है कि उसका सौन्दर्य आज भी हमें देखने को मिलता है।
References
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साक्षात्कार, श्री नन्द राम जी, राजमित्री उम्र 48, ग्राम मोवड़ी, पो0ओ0- गनियाद्योली, रानीखेत।
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