स्थानीय स्तर की राजनीतिक व्यवस्था में सकारात्मक कार्यवाही की भूमिका का मूल्यांकन

Authors

  • वीरेंद्र सिंह एसोसिएट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, एम एम एच कॉलेज गाजियाबाद
  • सुमित कुमार राजनीति विज्ञान विभाग, चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ।

Keywords:

स्थानीय राजकीय व्यवस्था, सकारात्मक कार्यवाही एवं भूमिका मूल्याकंन

Abstract

लोकतंत्र राजनीति विज्ञान के अवयवों में वह सबसे प्राचीन शब्द है। जिसने सर्वप्रथम मानवीय समाज में सर्व सहमति एवं स्वराज को मान्यता दी। जिसे क्रमबद्ध तरीके से प्राचीन भारतीय वैदिक संस्कृति, महाकाव्य कालखंड एवं बुद्ध संस्कृति से लेकर उपनिवेश कालीन साम्राज्य की सभ्यता तक कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक रूप से समाज के बीच वरीयता बनाई गई। हालांकि लोकतंत्र की परिभाषा को सामंतवादी, साम्राज्यवादी, पूंजीवादी, माक्र्सवादी दृष्टिकोणओं के आधार पर समय-समय पर परिवर्तन किया गया किंतु 1950 के दशक में पूरी दुनिया के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक बदले हुए आयामों में संवैधानिक आयाम को वरीयता देते हुए जन सामान्य को स्वराज्य की शक्ति का स्रोत माना गया। इसी आधार को भारत के राजनीतिक व्यवस्था का अंग बनाया गया। जिसमें जनता को सर्वाेपरि मानते हुए उसके अधिकार, न्याय, स्वतंत्रता समानता को सुनिश्चित करने के लिए लिखित संविधान की परिपाटी तैयार की गई। इसी क्रम में भारत में गांधीवादी दृष्टिकोणओं के आधार पर लघु व कुटीर उद्योग की संरचना के साथ लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण की परिभाषा सुनिश्चित हुई, जिसके संदर्भ में यह कहा गया कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए पंचायती राज व्यवस्था को क्रियान्वित किया जाए। जिस के संदर्भ में सामुदायिक विकास कार्यक्रम एवं पंचायती राज व्यवस्था को 1950 के दशक से ही वैधानिक रूप से वरीयता दी गई एवम 1990 के दशक में भारत में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक व्यवस्था देकर देश के नागरिकों को पूर्ण रूप से शासन में भागीदारी दी गई। अर्थात भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में समस्त जन सामान्य की लोकतांत्रिक भागीदारी को रेखांकित किया गया।

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Published

15-04-2022

How to Cite

वीरेंद्र सिंह, & सुमित कुमार. (2022). स्थानीय स्तर की राजनीतिक व्यवस्था में सकारात्मक कार्यवाही की भूमिका का मूल्यांकन. RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES, 9(1), 39–42. Retrieved from https://ijorr.in/ojs/index.php/rrssh/article/view/8