मृणाल पाण्डे की कहानियों में चित्रित नारी जीवन
Keywords:
महिला सशाक्तिकरण, महिला शिक्षा, पारिवारिक जिम्मेदारी, नारी गौरव, गामीण नारी, शहरी नारीAbstract
नारी ऊर्जा का अनवरत स्रोत है। क्षमताओं से भरा है नारी का आँचल। नारी सम्पूर्ण सृष्टि की आधारशिला है।
वैदिककालीन साहित्य के अध्ययन से ज्ञात होता है कि नारी को समाज में सम्मान प्राप्त था। शर-शर नहीं है, अपितु
गृहिणी ही गृह है। गृहिणी के द्वारा ही गृह का अस्तित्व है। उत्तरवैदिक काल में पुत्र प्राप्ति की कामना का वर्णन
यत्र-तत्र मिलता है। पितृसत्तात्मक समाज में धीरे-धीरे नारी के अधिकार को सीमित करने के प्रयास होते रहे।
मध्यकालीन साहित्यिक अध्ययनों द्वारा समाज की स्थिति के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्रियों की
शैक्षिक, आर्थिक सामाजिक स्थितियों का हा्रस होता रहा। अनेक सामाजिक कुरीतियों धार्मिक रीति-नीतियों की
गलत तरीके से व्याख्या कर स्त्रियों को दोयम दर्जे में धकेल दिया गया। साहित्यिक अध्ययनों द्वारा हमें तत्कालीन
सामाजिक व्यवस्था में स्त्री की स्थिति के बारे में जानकारी है। साहित्यकारों ने विभिन्न विधाओं के माध्यम से
ग्रामीण-शहरी परिवेश की नारी व निन्मवर्गीय, मध्यमवर्गीय, उच्च वर्गीय नारी के जीवन संघर्षों को अपनी लेखनी के
माध्यम से उजागर किया है। जहां अशिक्षित व सामाजिक कुरीतियों के भँवर में फँसकर ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों की
गरीब झुग्गी-बस्तियों की महिलाओं के शिक्षा व स्वास्थ्य की उपेक्षा होती रही वही मध्यमवर्गीय व शहरी क्षेत्रों की
उच्च वर्गीय महिला, व कामकाजी महिला, भी लैंगिंक हिंसा व पुरुष तंत्र में पिछला पायदान समझकर उपेक्षित ही
हुई है। समाज की इस विडम्बनापूर्ण स्थिति को साहित्य में स्थान देकर मौजूदा स्त्री मुक्ति विमर्श को आगे बढ़ाने की
जरुतर साहित्यकारों ने महसूस की है।
किसी भी सामाज की बेहतरी का मूल्यांकन वहां की महिलाओं की स्थिति को देखकर लगाया जा सकता है।
महिलाओं के शैक्षिक, आर्थिक व राजनीतिक सशक्तिकरण के कार्य को धरातलीय स्तर पर आगे बढ़ाने से ही उनकी
स्थिति में बदलाव आ सकते हैं।
References
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पाण्डे, मृणाल. चार दिन की जवानी तेरी, पृ0 20 राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लि० दिल्ली 2002
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