वेदों में यज्ञ की महत्ता
Keywords:
यज्ञ, वैदिक युगAbstract
वैदिक युग में यज्ञ की महत्ता है, जो व्यक्ति को पावन, पवित्र और कर्मठ बनाती है। यज्ञ की सम्पन्नता अग्नि से
होती है। अग्नि की प्रत्यक्ष शक्ति से वे परिचित थे। मंत्रों की सहायता से याज्ञिक कार्य किया जाता है तथा समस्त
याज्ञिक कार्यों में मंत्रों का सन्निवेश अपेक्षित है। इसके साथ ही विभिन्न सामग्रियों की सहायता से हव्य भी प्रदान
किया जाता है। घृत, दूध, धान्य आदि की आहुति दी जाती है तथा यह विश्वास किया जाता है कि अग्नि की उपर
उठने वाली लम्बी लपटें हव्य को देवताओं तक पहुँचा देती है। यज्ञ मात्र अग्निहोत्र को ही नहीं कहते हैं वरन् परमार्थ
परायण कार्य भी यज्ञ है। यज्ञ करने से वायुमंडल एवं पर्यावरण में शुद्धता आती है। संक्रामक रोग नष्ट होते हैं तथा
समय पर वर्षा होती है। यज्ञ से उत्पन्न अग्नि को घर पर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता था और वह भोजन आदि
बनाने के लिए प्रयोग किया जाता था। राष्ट्र रक्षा और समृर्द्धि के लिए राजसूय यज्ञ, वाजपेय यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ,
आदि कर राष्ट्र को विजयी और समृद्ध बनाने की योजनाएँ बनाई गई। प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए वर्षा
यज्ञ, इत्ती-भत्ति के निर्माण के लिए भी यज्ञों का विधान किया गया। मनुष्य के स्वास्थ्य एवं मानसिक उन्नयन के
लिए भी विविध प्रकार के यज्ञों का प्रचलन वैदिक काल से होता रहा है। मनुष्यों के सकल कामनाओं व रोग-शत्रु के
नाश तथा सर्वत्र विजय भावना के लिए यज्ञ का विधान है।
References
वैदिक साहित्य और संस्कृति-डॉ. किरण कुमारी-प्रथम भाग-न्यू भारतीय बुक कॉर्पोरेशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001, पृ. सं. 184-185
ऋग्वेदभाष्यम्-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-विश्व मानव उत्थान परिषद्, नई दिल्ली, संस्करण-2005, 2,2, पृ. 10-13
पंचविंश ब्राह्मण-1.8.4.1.
ऋग्वेदभाष्यम्-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-विश्व मानव उत्थान परिषद्, नई दिल्ली, संस्करण-2005,-अष्टमं मण्डलम्-त्रयोदशं सूक्तम-श्लोक-1, पृ. 885
यजुर्वेदभाष्यम-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-मानव उत्थान संकल्प संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक- 13, 27 अध्याय, पृ. 479
यजुर्वेदभाष्यम-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-मानव उत्थान संकल्प संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक - 42, 27 अध्याय, पृ. 485
यजुर्वेदभाष्यम-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-मानव उत्थान संकल्प संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक- 5, 31 अध्याय, पृ. 527
यजुर्वेदभाष्यम-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-मानव उत्थान संकल्प संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक-1, 31 अध्याय, पृ. 528
यजुर्वेदभाष्यम-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-मानव उत्थान संकल्प संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक-12, 31 अध्याय, पृ. 528
यजुर्वेदभाष्यम-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-मानव उत्थान संकल्प संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक-15, 31 अध्याय, पृ. 529
ऋग्वेदभाष्यम्-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-विश्व मानव उत्थान परिषद्, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक-33, अष्टम् मण्डल, 12 सुक्तम्, पृ.885
ऋग्वेदभाष्यम्-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-विश्व मानव उत्थान परिषद्, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक-5, अष्टम् मण्डल, 15 सुक्त, पृ. 888
ऋग्वेदभाष्यम्-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-विश्व मानव उत्थान परिषद्, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक-2, अष्टम् मण्डल, 19 सुक्तम, पृ. 895
ऋग्वेदभाष्यम्-महर्षि दयानन्द सरस्वती-प्रकाशक-विश्व मानव उत्थान परिषद्, नई दिल्ली, संस्करण-2005, श्लोक-30, अष्टम् मण्डल, 25 सुक्त, पृ. 901
Additional Files
Published
How to Cite
Issue
Section
License

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.