मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए भारतीय ज्ञान परम्परा

Authors

  • सागर सिंह सिरोला 1 शोध अध्येता, शिक्षाशास्त्र विद्याशाखा, शिक्षक शिक्षा विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, लाल बहादुर शास्त्री राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय हल्दूचौड़ नैनीताल, उत्तराखण्ड।
  • एल0 एम0 पाण्डेय आचार्य एवं विभागाध्यक्ष, शिक्षाशास्त्र विद्याशाखा, शिक्षक शिक्षा विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, लाल बहादुर शास्त्री राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय हल्दूचौड़ (263139) नैनीताल, उत्तराखण्ड

Keywords:

स्वास्थ्य, मनुष्य, आरोग्य, भारतीय, संस्कृति, ज्ञान परम्परा

Abstract

स्वास्थ्य मनुष्य की सर्वोच्च अमूल्य सम्पत्ति है। जो लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते हैं वे निरोगी जीवन जीते हैं। इसके विपरीत जो लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग नहीं रहते हैं, वे अपने स्वास्थ्य को खो देते हैं। सम्पूर्ण स्वास्थ्य मनुष्य की वह अवस्था है, जो मनुष्य को उसका जीवन प्रत्येक प्रकार से परिपूर्ण रूप में जीने योग्य बनाती है। इसी मर्म की महत्ता को समझते हुए अनादि काल से ही भारतीय संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान-विज्ञान परम्परा में स्वास्थ्य को जीवन का अभिन्न अंग माना गया है। स्वास्थ्य के सन्दर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा के अनुपालन में निहित षड्दर्शनों एवं विभिन्न उपनिषदों के सार तत्व द्वारा यह ज्ञात होता है कि पारलौकिक दृष्टि से अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु मनुष्य को स्वस्थ मन एवं स्वस्थ तन अर्थात आरोग्य की आवश्यकता होती है। आरोग्य के अभाव में लौकिक दृष्टि से भी मनुष्य वांछित सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है। अतएव आरोग्य रक्षा मनुष्य की प्रथम आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान परम्परा में आरोग्य को ईश्वर एवं प्रकृति की देन कहा गया है। प्राचीन भारतीय यौगिक ग्रन्थों के अनुसार, स्वास्थ्य के विभिन्न पक्ष होते हैं यथा- शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्वास्थ्य, भावनात्मक स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य। स्वास्थ्य के ये समस्त पक्ष एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा में चिकित्सा विज्ञान की भी महती भूमिका रही है। इसके अन्तर्गत आयुर्वेद एक प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक अस्तित्व को सन्तुलित रखना है। आयुर्वेद से सम्बद्ध विविध शास्त्रों में न केवल चिकित्सकीय विषयों का वर्णन मिलता है अपितु यह मनुष्य की पूर्ण आयु पर्यन्त उसके आचरण, व्यवहार, आहारचर्या, दिनचर्या एवं रात्रिचर्या आदि की आचार संहिता को भी उल्लेखित करते हैं, जिसके द्वारा मनुष्य को समाज में उत्तम जीवन जीने की कला का मार्गदर्शन प्राप्त होता है। इस प्रकार भारतीय ज्ञान परम्परा में स्वस्थ जीवन शैली को मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक कारक माना गया है।

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Published

20-06-2025

How to Cite

सागर सिंह सिरोला, & एल0 एम0 पाण्डेय. (2025). मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए भारतीय ज्ञान परम्परा. RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES, 12(01 (Special Issue), 55–59. Retrieved from https://ijorr.in/ojs/index.php/rrssh/article/view/139